गुरुवार, 5 दिसंबर 2013
शनिवार, 16 नवंबर 2013
सचिन की ऐतिहासिक विदाई
'सचिन' एक नाम, एक मान एक सम्मान एक कीर्तिमान। क़दम-क़दम पर जैसे कीर्तिमानों के फूल बिछे जा रहे हों। क्रिकिट में हर रन एक कीर्तिमान था उनका। अब उस दिन देखिए 14 नवम्बर 2013 का दिन। कीर्तिमान लिखने वाले शायद जानते हैं या नहीं लेकिन मैंने इस ऐतिहासिक कीर्तिमान का जोड़ ऐसे बैठाया है। शायद आपको भी अच्छा लगे। 14 नवम्बर को जब सचिन विदाई के आखिरी मैच में उतर रहे थे, उनके साथ एक कीर्तिमान चल रहा था। वे तब तक टेस्ट क्रिकिट में 15847 रन बना चुके थे। यही अंक एक कीर्तिमान बन गया। उनकी आज़ादी का, जिसके लिए आखिरी टेस्ट शृंखला खेली जा रही थी। जी हाँ, इन अंकों को अलग करके देखें 15 8 47 यानि देश की आज़ादी का दिन 15 अगस्त '47। और इस क्रिकिट बाँकुरे का भी आज़ादी का दिन 15-8-47 यानि 15847 रन बनते ही तय हो गया। उसे मूर्तरूप दे दिया गया।
शानदारी 74 रन की ठोस शुरुआत दे कर भारत की जीत प्रशस्त करने में उनका योगदान भी ऐतिहासिक बन गया।
कहते हैं जब ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। और ऐसा ही हुआ। भारत के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' के लिए भी खिलाड़ियों को सम्मान के रास्ते खुल गये। भले ही हॉकी के जादूगर ध्यानचंद भी इस दौड़ में शामिल हैं, किन्तु आज इस हर हिन्दुस्तानी के दिल की आवाज के आगे सत्ता ने भी सम्मान से सचिन को भारत रत्न की घोषणा कर एक अनोखा सम्मान दे दिया। अभूतपूर्व कृत्य करने वालों को ही तो दिया जाता है भारत रत्न। खेल में भले ही विज्ञापनों से आमदनी की अथाह बौछार होती है, किन्तु सचिन जैसे बेदाग खिलाड़ी कम ही होंगे।
सचिन को शुभकामनायें देने वाले करोड़ों लोगों में हम क्यों पीछे रहें। आइये इस कीर्तिपुरुष को सलाम करें।
सचिन अनोखा दे गए, एक और सम्मान।
घोषित भारत रत्न से, खुश है हिन्दुस्तान।
खुश है हिन्दुस्तान, करोड़ों का दिल जीता।
तुमने किया कमाल, खेल को मिली सुभीता।
कह 'आकुल' कविराय, अनोखा लेखा जोखा।
पहला भारत रत्न, खिलाड़ी सचिन अनोखा।
बुधवार, 18 सितंबर 2013
'आकुल' का लघुकथा संग्रह 'अब रामराज्य आएगा !!' का विमोचन उज्जैन में
'आकुल' को *भारतीय भाषा रत्न* से भी सम्मानित किया जाएगा
कोटा। फ्रेण्ड्स हेल्पलाइन, कोटा के सौजन्य से प्रकाशित डा0 गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' की नई पुस्तक लघुकथा संग्रह 'अब राम राज्य आएगा !!' छप कर तैयार है। इसका लोकार्पण पौराणिक नगरी उज्जैन (अवंतिका) में 13-14 दिसम्बर को आयोजित विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, गांधीनगर, भागलपुर (बिहार) के 18वें अधिवेशन में 14 दिसम्बर को रामनाथ सेवा आश्रम के विशाल प्रांगण में एक भव्य समारोह में लोकार्पित किया जाएगा। इस अधिवेशन में अखिल भारतीय स्तर के चुनिन्दा लगभग 150 प्रबुद्ध साहित्यकारों, कलाकारों, विद्वानों को सारस्वत सम्मान प्रदान किया जाएगा। श्री 'आकुल' के लघुकथा संग्रह के विमोचन के लिए विद्यापीठ के कुलसचिव डा0 देवेन्द्रनाथ शाह से स्वीकृति मिल गयी है। इस अधिवेशन में श्री 'आकुल' को *भारतीय भाषा रत्न* सारस्वत सम्मान भी प्रदान किया जाएगा। 'आकुल' की यह चौथी पुस्तक है। 100 पृष्ठीय इस संग्रह में लघुकथा, बोधकथा प्रेरक प्रसंग आदि 35 कथाओं का संग्रह है। हेल्पलाइन के प्रबंध सम्पादक एवं मानद सचिव श्री नरेंद्र कुमार चक्रवर्ती ने बताया कि संग्रह सशक्त सम सामयिक घटनाओं का जखीरा है जिसमें सत्यघटनाओं और वर्तमान भारत की दशा दिशा, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अक्षुण्ण दर्शन का लघुकथाओं के माध्यम से जीवंत चित्रण किया गया है। इस लघुकथा संग्रह में भूमिका राजस्थान के मूर्धन्य वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् पं0 गदाधर भट्ट ने लिखी है।
गुरुवार, 25 जुलाई 2013
सोमवार, 22 जुलाई 2013
सान्निध्य: गुरुवे नम:
सान्निध्य: गुरुवे नम:: 1 अक्षर ज्ञान दिवाय कै, उँगली पकड़ चलाय। पार लगाये गुरू या, केवट पार लगाय।।1।। 2 बिन गुरुत्व धरती नहीं, धुर बिन चले न चाक। गुरु...
रविवार, 21 जुलाई 2013
जिज्ञासा के माध्यम से युगबोध कराता श्रेष्ठ काव्य संकलन है 'क्यों'
नहीं इसे समीक्षा
नहीं समझें। आपको उनके भीतर उठ रहे *क्यों* का ज्वार समझने के लिए ही पढ़ने की
जिज्ञासा उत्पन्न करनी पड़ेगी। पहले उनकी पुस्तकों के कुछ अंश- (वसीयत) से- ‘’जिंदगी
भर--- पिता ने----कवच बनकर---- बेटे को सहेजा------लेकिन---- पु्त्र कोसता रहा-----
जन्मदाता पिता को-----और---- सोचता रहा----- जाने कब लिखी जाएगी वसीयत मेरे नाम--‘’
प्रश्न चिह्न ‘?’ खड़ा किया है उन्होंने उन बच्चों की उच्छृंखलता पर जो अपनी
असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति अपने पिता द्वारा पूरी किये जाने को अपना अधिकार
समझते हैं----या----उन पिताओं के लिए जिनसे चूक हो गयी ऐसे संस्कार देने में जहाँ
पिता के जूते बेटे के पैरों में आते ही वह मित्र हो जाता है और बेटा समझने लग जाये
कि मुझे अब पिता के कंधे पर बोझ नहीं कंधे से कंधा मिला कर चलना होगा--- उनका उत्तरदायित्व
खत्म अब मेरा कर्तव्य आरंभ। उनकी दूसरी रचना देखें – (माँ बाप का साथ) से- ‘’समय
के साथ----बदलाव आवश्यक है-----लेकिन---सब कुछ बदलकर---भूगोल तो मिट सकता है-----पर----
इतिहास नहीं--------क्योंकि-----इतिहास मस्तिष्क में होता है----इ्रसलिए-----एक
सुझाव और दूँ------नये घर में-----सपाट दीवारों के साथ---------एक कोन में ही
सही-----एक आला रहने दो------जहाँ------दीपक की रोशनी बनकर---माँ हमेशा तुम्हारे
साथ होगी।‘’ फिर एक *क्यों* माँ, अंकुरित पहले बीज से ही उसे सहेजती है पर
बेटा क्यों भूल जाता है उसे किसी हवा में है ऐसी ताकत जो भुला देती है माँ की असीमित
तकलीफों को जो कभी गाहे बगाहे उसने देखी सुनी और माँ या पिता द्वारा बताई गई
होगी----क्यों होता है ऐसा ? पिता मौन रह सकता है किंतु माँ की तड़प मौन रह कर भी
अहसास करा जाती है। (जुल्म) से- ‘’---लेकिन---यह भी तो तय है-----कि-----तुम्हारा
मौन----सदियों से चली आ रही---तुम्हारी वंश परम्परा को------खत्म कर सकता
है-------इसलिए-----जुल्म सहने का इतिहास नहीं----बल्कि—जुल्म खत्म करने का
इतिहास बनाओ और -----अमर हो जाओ।‘’ जुल्म पर चक्र का यह क्यों मेरी कविता से
समझ में आ सकता है ---*आज समाज क्यों टूटते जा रहे हैं----मौन के
कारण-------आज संस्कार क्यों खत्म होते जा रहे हैं----------मौन के
कारण--------आज आदमी क्यों बदल रहा है----------मौन के कारण----------आज युवा क्यों
आवेग में है----------मौन के कारण---------कोई नहीं बोलता कि क्यों कर कर रहे
हो-----ऐसा आज तक नहीं हुआ---------बदलो मगर ऐसे भी नहीं कि इतिहास बदल
जाये-----और तुम इतिहास में उन पन्नों को ढूँढ़ भी न पाओ।* (मेरी रचना मौन के
कारण से) ऐसी अनेकों रचनायें प्रश्न चिह्न नहीं यक्ष प्रश्न खड़ा करती हैं।
सचमुच उनहोंने ऐसे विषय उठाये हैं जो इस पुस्तक को यादगार बनायेंगे-----इन प्रश्नों
को पढ़ना आत्मसात करना अपने अहं की तुष्टि के लिए अत्यावश्यक है-----जैसे (समय)
से- ‘’घड़ी की सूइयाँ----पीछे करके-----स्वयं को संतुष्ट करना------कि----मैंने
समय को-------वश में कर लिया है----‘’समय के साथ न चलने के लिए खड़ा होता एक
प्रश्न *क्यों* (हम किन्नर हैं) से- ‘’गर्भधारण न कर पाना-------हमारी
शारीरिक नपुंसकता नहीं-----बल्कि-----तुम्हारी मानसिक नपुंसकता है-------क्योंकि-------शरीर
से अधिक------मन की नपुंसकता खतरनाक होती है-------इसलिए---हम बहुत खुश
हैं-------भले ही हम किन्नर है’’ किताब की सबसे बड़ी कविता है—इस का शीर्षक
भले ही हम किन्नर होता तो और प्रभाव डालती---- शीर्षक हमें इंगित करता है *क्यों---क्या
तुम?’ इस पूरी पुस्तक को व्यंगय के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। क्यों का
प्रश्न करते करते कवि ने अपना दुख भी व्यक्त किया है ‘कवि का दुख’ मेंनन्हीं बूँद, नदी की आत्मकथा, बीनने वाले, जींस और टॉप, पथ प्रदर्शक आदि
कवितायें हर बदलते युवा को अपनी जमीं न भूलने की हिदायत देती हैं-----कि हम कहीं
इस *क्यों* ‘को ढूँढ़ते ढूँढ़ते खो न जायें? डा0 ओम शिव ओम अम्बर ने अपनी भूमिका
में उन्हें अशिव का संहार करने को संकल्पित कवि बताया है, सच है। कविताओं की अनेकों
पुस्तकों में यह पुस्तक *क्यों* सचमुच श्री चक्र को काव्य जगत् के अग्रणी
कवियों में साथ बैठने का आग्रह करती है। उनकी पिछली पुस्तक साहित्यकार- 5 के बाद की यह उनकी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक है।- आकुल
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