मंगलवार, 14 मई 2013

ऐसे रचनाकारों का बहिष्‍कार करें

   ऐसा सुना भी था कि लोग गोष्ठियों में दूसरों की रचना पढ़ कर वाहवाही लूटते हैं। लाइब्रेरी से पुस्‍तकें चुराते हैं। यह उनका जुनून हो सकता है, साहित्‍य के प्रति उनका बेहद रुझान हो सकता है, किंतु किसी की रचना को अपने नाम से प्रकाशित करवाना (भले तोड़ मरोड़ कर) कदापि उचित नहीं है। ऐसे रचनाकारों का बहिष्‍कार होना चाहिए। आप भी श्री आर0 सी0 शर्मा 'आरसी' के इस संदेश को पढ़ कर 'सुरेंद्र शर्मा, जयपुर' को अपने विचार प्रेषित करें, उन्‍हें आगाह करें, यह चोरी एक ऐसा अपराध है जिसकी सज़ा ताउम्र उन्‍हें छलनी करती रहेगी। वे साहित्‍य समाज में अपना मुँह छिपाते फि‍रेंगे और एक रचनाकार अपनी मौत से पहले मर जाएगा। स्‍वस्‍थ रचना करें और अपना अलग स्‍थान बनायें। 'मधुमती' जैसी साहित्‍य अकादमी की पत्रिका में ऐसी त्रुटि जबकि यह कविता पहले श्री आर0 शर्मा0 आरसी के नाम से छप चुकी है, वहाँ के सम्‍पादकीय मंडल पर प्रश्‍नचिह्न खड़ा करती है। सभी पत्र पत्रिकाओं के सम्‍पादक इससे सचेत हों और बिना तसदीक किये, बिना स्‍वरचित का प्रमाण लिए, रचनाएँ कितनी भी उत्‍कृष्‍ट क्‍यों न हों, नहीं छापें। ऐसे दुष्‍कृत्‍यों से मूल लेखक के मन को आघात पहुँचता है। कोटा से प्रकाशित प्रतिष्ठिति पत्रिका 'दृष्टिकोण' में ऐसा हो चुका है, प्रकाशन से पूर्व संदेह होने पर उसे प्रकाशित नहीं किया गया। रचनाकर्म में संलग्‍न रचनाकार को कहाँ फुरसत है कि विशाल साहित्‍य और प्रकाशन की दुनिया की प्रत्‍येक पत्रिका को जाँचता, पढ़ता रहे कि कहीं उसकी रचना का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। यह सुधि पाठकों व सम्‍पादकों का विशेष उत्‍तरदायित्‍व है कि वह ऐसे  चोर रचनाकारों पर नज़र रखें और उनका बहिष्‍कार करें। सुरेन्‍द्र शर्मा को भी चाहिए कि वे हृदय में स्‍वयं को टटोलें और यदि ऐसा कृत्‍य सही है तो श्री 'आरसी' से क्षमा माँगे और उनके ब्‍लॉग पर खेद व्‍यक्‍त करते हुए साहित्‍य की गरिमा को क्षति पहुँचाने के लिए सभी साहित्‍यकारों से रूबरू हों-आकुल

     दोस्तों आज थोड़ा मन दुखी है,कारण कोइ विशेष नहीं परन्तु आज मन केवल इस बात से दुखी हो रहा है की कुछ लोग केवल छपने की खातिर (छपास )रचनाकारों की रचनाएं चोरी करके या तो उसमें थोड़ा सा रद्दोबदल करके या हूबहू प्रतिष्ठित पत्रिकाओं को भेज देते है और सम्पादक भी उनको छापने में गुरेज नहीं करते |आज राज० साहित्य अकादमी की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका "मधुमती "का मई २०१३ का अंक देखा और अचानक पेज संख्या १०९ पर आकर निगाह ठिठक गयी और देखा तो जयपुर के किसी सुरेन्द्र शर्मा के नाम से एक गीत छपा था जो कि मेरे गीत
आर0 सी0 शर्मा0 'आरसी'
की नक़ल के अलावा और कुछ नहीं थाऔर यही गीत आज सेकुछ पूर्व इसी पत्रिका में मेरे नाम से छप चुका है जब डा० श्रीमती अजित गुप्ता अध्यक्ष थीं
|पता नहीं सुरेन्द्र शर्मा मधूमती के नियमित पाठक हैं या नहीं परन्तु मैं ८-१० वर्षों मधुमती का नियमित पाठक हूँ व् प्रतिमाह मेरे घर आती है|अगर उनको इतना पसंद था मेरा गीत तो मुझसे कह देते मैं उनके नाम कर देता अपना गीत |परन्तु साहित्यकार होकर चोरी शोभा नहीं देती |

मैं कोटा व जयपुर के समस्त साहित्यकार बंधुओं से इस मंच से (फेसबुक)अपील करता हूँ की ऐसे व्यक्ति(सुरेन्द्र शर्मा ) का बहिष्कार करें जो चोरी के साहित्य से नाम कमाना चाहते हैं |मैं यहाँ उनका फोन न० व पता दे रहा हूँ साथ ही अपना गीत (जो ५०--६० पत्रिकाओं में छप भी चुका है) भी आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूँ ताकि आप ऐसे व्यक्ति को फोन द्वाराएवं व्यक्तिगत रूप से समझा सकें की वो अच्छा काम नहीं कर रहे|उनका फोन न० है ०9314445539 पता है :-सुरेन्द्र शर्मा 54-Aविजय नगर प्रथम -करतारपुर जयपुर- 302006 .फैसला आप सभी पर छोड़ते हुए |आर० सी० शर्मा "आरसी"

श्री आर सी शर्मा 'आरसी' के फेसबुक खाते से साभार।   

1 टिप्पणी:

  1. साहित्यिक चोरी कोई नई बात नहीं है।कुछ लोग जो छ्पास रोग से पीडित हैं ,या मंचों पर वाह वाही बटोरने के शौकीन हैं इस तरह की हिमाकत करते रहते हैं । आप उनका कुछ नहीं बिगाड सकते क्योंकि कुछ इतने ढीट होते हैं कि मंच पर भी मूल कि वे के रहते हुए , उसीके सामने अपने नाम से कविता पढ जाते हैं। और सीनाठोक कर दूसरे की रचना को अपनी साबित करने पर आमादा भी हो जाते हैं,एसा मेरा अनुभव है। ।उनका भला कोई क्या बिगाड लेगा.....? कोशिश की जा सकती है...।

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