रविवार, 4 दिसंबर 2011

साहि‍त्‍यि‍क सांस्‍कृति‍क कला संगम अकादमी, परि‍यावाँ में जनकवि‍ ‘आकुल’ और रघुनाथ मि‍श्र सम्‍मानि‍‍त

कोटा। 30 अक्टूबर को महाभारत के शि‍खर शांतनु, मृत्‍युंजय भीष्म और मत्स्‍यगंधा की जन्मभूमि‍ परि‍यावाँ में जो उत्तरप्रदेश के प्रातापगढ़ जि‍ले से 60 कि‍मी0 और प्रख्यात संत कृपालुजी महाराज की जन्मभूमि‍ मनगढ़ के समीप ही ग्रामीण अंचल की मनोहारी भरतभूमि‍ परि‍यावाँ में एक महान् वटवृक्ष के नीचे सादे समारोह में महामना मदनमोहन मालवीय पोषि‍त साहि‍त्यिक संस्थान ‘साहि‍त्यि‍क सांस्कृति‍क कला संगम अकादमी’द्वारा आयोजि‍त सम्मान समारोह में लगभग 80 साहि‍त्यकारों को सम्मानि‍त कि‍या गया। इस समारोह में अन्‍य संस्था‍नों यथा तारि‍का वि‍चार मंच इलाहाबाद और भारतीय वांग्मय पीठ कोलकाता द्वारा भी साहि‍त्यकारों को सम्मानि‍त कि‍या गया। अकादमी के सचि‍व श्री वृन्दायवन त्रि‍पाठी रत्नेश यह जि‍म्मेदारी 1980 से सम्हा‍ल रहे हैं और प्रति‍वर्ष यह समारोह आयोजि‍त हो रहा है, जि‍समें अभी तक 500 से भी अधि‍क साहि‍त्‍यकारों को सम्मा‍नि‍त कि‍या जा चुका है। 16 प्रान्तों से पधारे साहि‍त्यकार भारत की भाषाई एकता को एक सूत्र में पि‍रो कर सभी भेदभावों को भुला कर एक मंच के नीचे इकट्ठा हुए। इस वर्ष भी परि‍यावाँ में सभी पधारे साहि‍त्यकारों, कवि‍यों, कलाकारों को सम्मानि‍त कि‍या गया। अकादमी की ओर से यह समारोह 30वें भाषाई एकता सम्मेलन के रूप में आयोजि‍त कि‍या गया।
प्रथम सत्र में माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्‍वलन के पश्चात् भाषाई एकता पर व्याख्यांन माला का शुभारम्भ कि‍या गया। समारोह की अध्यक्षता भारतीय वांगमय पीठ कोलकाता के सचि‍व श्री श्यामलाल उपाध्याय थे और कार्यक्रम का संचालन प्रख्यात साहि‍त्यकार बज-बज, कोलकाता से पधारे डॉ0 कुँवर वीर सि‍ह मार्तण्ड थे। कार्यक्रम में कोलकाता के सत्यनारायण सिंह आलोक, इम्‍फाल से श्री हुइरोम गुणीन्द्र सिंह लैकाई, वि‍जय कुमार शर्मा, मेरठ, इगलास के गाफि‍ल स्वामी, कोटा के श्री रघुनाथ मि‍श्र, संचालक श्री मार्तण्ड, अध्यक्ष श्री उपाध्याय और कई वि‍द्वानों ने भाषाई एकता पर अपने वि‍चार प्रकट कि‍ये। सभी ने एक मत हो कर कहा कि‍ संवि‍धान की अनुसूचि‍यों की भाषाओं को, राजभाषा हि‍न्दी को राष्ट्रमभाषा के रूप में पहचान बनाने के लि‍ए पहल करनी होगी। आज हि‍न्दी वि‍श्व के अनेकों वि‍श्ववि‍द्यालयों में पढ़ाई जा रही है, क्योंकि‍ व्या‍वसायि‍क दृष्टि‍ से भारतीय बाजार में पैठ बनाने के लि‍ए भारतीयों को अपना जुड़ाव पैदा करने के लि‍ए हि‍न्दी का समृद्ध होना अति‍ आवश्ययक है। दूसरे सत्र में वि‍भि‍न्ऩ सम्मानों को प्रदान कि‍या गया। समारोह में हि‍न्दी सेवा सम्मान, वि‍वेकानन्दज सम्मान, वि‍द्या वाचस्पति‍ मानद उपाधि‍, वि‍द्या वारि‍धि‍ मानद उपाधि‍, कला मार्तण्ड, हि‍न्दी गरि‍मा सम्मान,कबीर सम्मान आदि‍ प्रदान कि‍ये गये। राजस्थान से कोटा के जनकवि‍ आकुल को वि‍वेकानन्द सम्मान, श्री मि‍श्र को वि‍द्या वाचस्पति‍ की मानद उपाधि‍, रावतसर के श्री मुखराम माकड़ को सुश्री सरस्वती सिंह सुमन स्मृति‍ सम्मान, रावतभाटा से, भवानी मण्डी से राजेश कुमार शर्मा पुरोहि‍त को वि‍द्या वारि‍धि‍ मानद उपाधि‍ और अलवर के श्री सुमि‍त कुमार जैन को साहि‍त्य महोपाध्याय मानद उपाधि‍ से सम्मा‍नि‍त कि‍या गया। अन्य वि‍भूति‍यों में कोलकाता के श्री श्यामलाल उपाध्याय को साहि‍त्य महोपाध्याय, श्री अशोक पाण्डेय गुलशन को पं0 जगदीश नारायण त्रि‍पाठी स्मृति‍ सम्मान, सत्यनारायण सिंह आलोक, फ़ख़्रे आलम खाँ, मेरठ, सुश्री आशा मि‍श्रा, दति‍या, मनोज कुमार वार्ष्णेय मेरठ आदि‍ को वि‍द्या वाचस्पति‍ मानद उपाधि‍, बि‍जनौर के मनोज अबोध, गोरखपुर के अशोक कुमार नि‍र्मल, अवधेश शुक्ल, सीतापुर, पूनम शर्मा, जबलपुर आदि‍ को वि‍द्या वारि‍धि‍ की मानद उपाधि‍, सुरेश प्रकाश शुक्ल, लखनऊ, सुश्री सीमा गुप्ता, अलवर और पि‍थौरागढ़ की सुश्री शारदा वि‍दुषी को वि‍वेकानन्द सम्‍मान प्रदान कि‍या गया। मनोज कुमार वार्ष्णेय, मेरठ को पत्रकार मार्तण्ड पुरस्कार भी प्रदान कि‍या गया।
अकादमी के इस सम्मान समारोह की सहयोगी संस्थाओं तारि‍का वि‍चार मंच, इलाहाबाद और भारतीय वांगमय पीठ, कोलकाता ने अनेकों साहि‍त्यकारों को सम्मानि‍त कि‍या। वांग्मय पीठ कोलकाता द्वारा अन्‍य साहि‍त्‍यकारों के साथ आकुल व श्री रघुनाथ मि‍श्र को भी कवि‍ गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर सारस्व‍त साहि‍त्य सम्मान प्रदान कि‍या गया। तारि‍का वि‍चार मंच ने श्री मि‍श्र को पं0 रामकुमार वर्मा सम्‍मान से सम्मानि‍त कि‍या। दूसरे दि‍न श्री मार्तण्ड, श्रीमि‍श्र, आकुल, श्री आलोक और श्री अकेला ने मनगढ़ स्थि्‍त जगद्गुरु कृपालुजी महाराज के आश्रम जाकर प्रख्यात राधाकृष्ण मंदि‍र देखा और कृपालुजी महाराज के दर्शन कि‍ये, उनके जीवन दर्शन की चि‍त्रमय झांकी देखी और उनका योग आश्रम देखा।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

अरुण श्रीवास्तव ‘मुन्ना जी’ नहीं रहे

हम सब साथ साथ के सहयोगी प्रकाशन, झांसी से प्रकाशित होने वाली कायस्थ समाज की लोकप्रिय ‘चित्रांश ज्योति’के संस्थापक व प्रकाशक झांसी निवासी श्री अरुण श्रीवास्तव ‘मुन्ना जी’ का गत् 5 अक्तूबर, 2011 को लखनऊ स्थित मेडिकल कालेज में एक बीमारी के चलते आकस्मिक निधन हो गया। वह 52 वर्ष के थे। अपने पीछे वह पत्नी सहित दो नाबालिग बच्चे छोड़ गए हैं। आप लगभग तीन दशकों तक दैनिक जागरण, झांसी के संपादकीय विभाग में कार्य करते हुए बतौर लेखक मुख्यतः70-90 के दशक में रेडियो के अलावा दैनिक जागरण सहित धर्मयुग, लोटपोट, बाल भारती, दीवाना तेज, पराग, फिल्मी दुनिया, माधुरी आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे थे। विभिन्न पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशित ‘आपके अटपटे प्रश्न और मुन्नाजी के चटपटे उत्तर’ आपका लोकप्रिय स्तंभ रहा था। इस स्तंभ के अंतर्गत पाठकों के अटपटे प्रश्नों के जवाब में आपके चटपटे व काव्यात्मक उत्तर उस समय बेहद लोकप्रिय रहे थे। आपने किशोरावस्था में ही लेखन व पत्रकारिता शुरू कर दी थी और उसी समय ‘मृगपाल’ नामक एक मासिक पत्रिका का संपादन भी प्रारम्भ कर दिया था। आपको लेखन व पत्रकारिता के अलावा गायन व समाज सेवा का भी शौक था। आपने झांसी जिले में कायस्थ समाज के उत्थान के लिए भी अनेक कार्यक्रम आयोजित किए और अंतिम समय तक कायस्थ समाज की पात्रिका ‘चित्रांश ज्योति’ का प्रकाशन भी करते रहे। आपको विभिन्न उल्लेखनीय कार्यों के चलते अनेक सम्मान भी प्राप्त थे। आप अत्यन्त मिलनसार व सामाजिक प्रकृति के व्यक्ति थे। आपके आकस्मिक निधन से आपके हजारों चाहने वाले दुखी व स्तब्ध हैं।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

शब्‍द दो तुम मैं लि‍खूँगा

आज आक्रोश दि‍न पर दि‍न बढ़ रहा है। बात काश्‍मीर की हो या भ्रष्‍टाचार की,जन समस्‍याओं की हो या महँगाई की,राजनीति‍ की हो या साहि‍त्‍य की,आम आदमी इतना त्रस्‍त हो चला है कि‍ धैर्य छूटने लगा है,हाथ में जलजले उठाने को तैयार है वह,आँखों में वहशत को देख कर लगता है कि‍ भवि‍ष्‍य में कुछ अनि‍ष्‍ट होने वाला है,न्‍यायाधीश बेबस अपने नि‍र्णयों की धज्‍जि‍याँ उड़ते देख रहे हैं,कि‍स का गुस्‍सा कि‍स पर उतर रहा है,नगरपालि‍काओं में मूलभूत आवश्‍यकताओं के लि‍ए लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं, हिंसक प्रवृत्‍ति‍याँ बढ़ रही हैं, रक्षक भक्षक बन रहे हैं, भ्रष्‍ट लोग अब जैसे एक ही दि‍न में पूरी देश को लूट कर भागने की फ़ि‍राक़ में हैं, गुण्‍डागर्दी हद कर रही है, उत्‍तर प्रदेश में तानाशाही फ़लक़ पर है, संवि‍धान के मूल अधि‍कार केवल कागज़ों में मुँह छि‍पा रहे हैं। क्‍या इसी को रौरव कहते हैं, पुराणों में वर्णि‍त एक नर्क। पूरे देश पर धीरे धीरे एक अभेद्य वायरस का जमावड़ा होने लगा है, याद आ रहा है अंग्रेजी फि‍ल्‍म 'इनडि‍पेंडेंस डे' जि‍समें दूसरे ग्रह के प्राणि‍यों ने अमेरि‍का पर अपना जाल फैलाया और कि‍स तरह से जाँबाज़्रों ने देश को फि‍र एक आज़ादी में हवा लेने के लि‍ए अपनी जाँ की बाज़ी लगाई। आज अपने देश में फि‍र एक जनक्रांति‍ की आवश्‍यकता महसूस की जा रही है, पर इसके पहले और कि‍तना रक्‍तपात--- यह आप और हमें सोचना है।

शब्द दो तुम मैं लि‍खूँगा, इक अमि‍ट इति‍हास फि‍र।
याद रक्खेगा तुम्हें अपना वतन हर साँस फि‍र।।
कब तलक सोते रहोगे,वक्त की आवाज़ है।
साहि‍लों की मौज़ों में तूफानों का अंदाज़ है।
कर दो तुम नाकाम उन शैतानों की हर कोशि‍शें।
कर दो तुम ख़ाति‍र वतन, क़ुर्बान अब हर ख्‍वाहि‍शें।
खूँरेज़ी का दौर है, दुश्मन नहीं कमज़ोर है।
बि‍जलि‍यों का शोर है, ग़म की घटा घनघोर है।
अपनी हर तकलीफ़ को मोहरा बना कर कि‍श्त दी।
उसको ना मुँह की पड़े, जो तुमने ना शि‍कस्त दी।
फि‍र बढ़ेगा हौसला, दुश्मन का तुम ये जान लो।
फि‍र लि‍खेगा खून से लथपथ कहानी जान लो।
हाथ दो उड़ने को दूँगा मैं नई परवाज़ फि‍र।
याद रक्खेगा तुम्हें अपना वतन हर साँस फि‍र।।

सान्निध्य: वि‍श्‍व दृष्‍टि‍ दि‍वस

सान्निध्य: वि‍श्‍व दृष्‍टि‍ दि‍वस: बचें दृष्टि से दृष्टि‍‍दोष संकट फैला है चहुँ दि‍श। नि‍कट, दूर या सूक्ष्म दृष्टि‍ सिंहावलोकन हो चहुँ दिश।। दृष्टि‍ लगे या दृष्टि पड़े जब डि‍...

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

सान्निध्य: कितने रावण मारे अब तक

सान्निध्य: कितने रावण मारे अब तक: कितने रावण मारे अब तक कितने कल संहारे मन के भीतर बैठे रावण को ना मार सका रे तेरी अंतरात्मा षड् रिपु में पड़ी हुई है इसीलिए यह धारा रावणों से...

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

सान्निध्य: दशहरा

सान्निध्य: दशहरा: सुनहुँ राम वानर सेना संग सीमा में घुस आये। घोर नि‍नाद देख चहुँदि‍स सेना नायक घबराये।। कुंभकरण संग मेघनाद समरांगण स्‍वर्ग सि‍धारे। बलशाली से...